सोमवार, 16 सितंबर 2019

जैन श्रावक के 12 व्रत भाग 1

जैन धर्म असंख्य वर्षो से संसार में चला रहा है | जैन धर्म में तीर्थंकर भगवान ने दो प्रकार के धर्म को प्रतिपादित किया -1. सर्व-विरति (जो दीक्षा लेकर साधू साध्वी बनते हे अर्थात संसार को त्याग देते है कंचन, कामिनी के त्यागी) 2. देश विरति (संसार में रहते हुए धर्म आराधना करते है इन्हे श्रावक-श्राविका बोलते हैइस प्रकार से श्रावक धर्म में 12 व्रत का पालन सभी जैन धर्म के अनुयायियों को करना चाहिये |


श्रावक के 12 व्रत इस प्रकार से है -
(1) स्थूल प्राणातिपात विरमण व्रत  (2) स्थूल मृषावाद विरमण व्रत (3) स्थूल अदत्तादान विरमण व्रत (4) स्थूल मैथुन विरमण व्रत (5) स्थूल परिग्रह विरमण व्रत (6) स्थूल दिक परिमाण व्रत (7) स्थूल भोगोपभोग विरमण व्रत (8) स्थूल अनर्थदण्ड विरमण व्रत (9) सामायिक करण व्रत (10) देशावगाशिक व्रत (11) पौषध व्रत (12) अतिथि संविभाग व्रत

उपरोक्त  बारह व्रतों के तीन भाग किये गए है | प्रथम पांच को अणुव्रत अगले तीन को गुणव्रत व अंतिम चार शिक्षा व्रत कहलाते है | ये अणुव्रत साधुभगवन्तों द्वारा पाले जाने वाले पांच महाव्रतों से लघु है  व सरल है अतः इन्हें अणुव्रत कहते है | अगले तीन व्रत इन पांच अणुव्रतों के सहायक व उनमें दृढ़ता लाने में सक्षम है, अतः वे गुणव्रत कहलाते है | अंतिम चार व्रत के पालन से हमारी आत्मा को उत्तम शिक्षा प्रदान करते है, अतः इन्हें शिक्षाव्रत कहा गया  है | धन का धर्म-मार्ग पर सद्व्यय करने में अतिथि संविभाग व्रत का सहारा लेना चाहिये |
   बारह व्रत ग्रहण करते समय श्रावक को सर्व विरति साधू मार्ग की प्राप्ति की भावना रखनी चाहिये | यही नहीं उसे निम्नलिखित चार पुरुषार्थों को आत्मा में पनपाने चाहिये : 1. मन, वचन व काया को नियमित करने हेतु विचारों को अशुभ क्रियाओं से हटाकर शुभ क्रियाओं की ओर प्रवत्त करना |
2. विषय वासनाओं का त्याग कर शुभ भावनायें करना | 3. पूर्व अनुबंधित कर्मों की निर्जरा व नये कर्म बंधन को रोकना |  4. यदि नये कर्म उत्पन्न हो रहे हो तो उन पर शुभ प्रभाव |
  बारह व्रतों में :-

(1) स्थूल प्राणातिपात विरमण व्रत

इसे स्थूल अहिंसा व्रत भी कहते है, भगवान् महावीर का आदेश है कि किसी भी जीव की हिंसा न की जाये | जैसे हमें अपना जीवन प्रिय है, वैसे ही हर प्राणी को अपना जीवन प्रिय है | जब हम सदैव सुखी रहना चाहते है तो अन्य प्राणियों को दु:खी करने का हमें क्या अधिकार है | शरीर में कहीं छोटे से घाव के लगने पर या किसी अंग के कटने मात्र से हमारी कैसी दयनीय स्थिति हो जाती है तो हिंसा से अन्य प्राणियों को कितना असहनीय दर्द होता होगा | जब हम जीना चाहते है तो दूसरों के प्राण लेने का हमे क्या अधिकार है, स्मरण रहे जब तक हमारी अन्य जीवों को मारने की प्रवृति जारी है, तब तक हमे भी मरना ही पड़ेगा | अन्य प्राणियों को कष्ट देकर सुख की आशा करना बबूल बो कर आम की आशा करने के जैसी है | जैसी करनी वैसी भरनी | जैसा दान वैसा फल |अतः अन्य प्राणियों के भय को दूर करें ताकि हमारा अपना भय दूर हो जाए |

        जो दूसरों की रक्षा करते है तथा सुख पहुंचाते है, वास्तव में वे अपनी ही रक्षा करते है  | वे अपने लिए सुख-शान्ति के बीज बोते है | जो व्यक्ति दूसरों को मारता है वह स्वयं भी मरता है आम, लीची आदि मीठे फलों के बीज लगाने से मीठे फल मिलते है | बेरी, कीकर ओर नीम के वृक्ष रोपने पर कांटेदार तथा कड़वे फल ही प्राप्त होते है, कहा भी गया है  कि " रोपे बिरवा आक का, आम कहाँ से खाए " | अतः जैसी फसल उगायेंगे, वैसे ही फल घर ला सकेंगे | यह विश्व का शाश्वत नियम है | अतः  अन्य जीवात्माओं के प्रति किये गये अच्छे-बुरे व्यवहार का प्रतिफल प्रकृति हमें देगी | हृष्ट पुष्ट बलवान बनकर जो मानव दुसरों को सताता है, उससे तो उसका लूला, लंगड़ा या अपाहिज होना ही अच्छा है |
        इस बारे में एक पुरानी कहावत है - "दुर्बल को न सताइये, मोटी वाकी हाय | मुई खाल के स्वास सों, सार भस्म हो जाय" || अर्थात अत्याचार मत करिये, दुःखी की आह अत्याचारी  को भस्म कर देती है, बर्बाद कर देती है, अतः धर्मात्मा श्रावक को निर्दयता का त्याग करके ही धर्म आराधना करनी चाहिए बिना दया, करुणा के की गई देवगुरु की पूजा, दान, तप, शास्त्र श्रवण तथा तीर्थ-यात्रा आदि सभी शुभ कर्म व्यर्थ है, कई लोग अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति करने और अपने दुःख दूर करने हेतु काल्पनिक देवी-देवताओं के समक्ष बिचारे अवाक पशुओं की बलि चढ़ाते है | यह बलि योग्य नहीं है और कई दुःखों की कारण रूप बनती है | ऐसे ही अनेको निःसंतान मूर्ख वंश परम्परा को चलाने हेतु मूक पशुओं का वध करते हैं | किन्तु वे वंश परम्परा की उन्नति की जगह वंश की अवनति के तथा हानि के कारण रूप बनते है |
        अहिंसा व्रत के पालन के फलस्वरूप हमें सर्व प्रकार के सुख, बल, उत्साह, दीर्घायु, स्वास्थ्य व सुंदरता प्राप्त होती है | यही नहीं मान, प्रतिष्ठा, सर्व इन्द्रियों की असीम शक्ति, सुंदर देश, अच्छा परिवार, उच्च कुल व धन-धान्य की समृद्धि की प्राप्ति भी अहिंसा व्रत के पालन के फलस्वरूप ही मिलती है |
       अन्याय, अत्याचार, क्रूरता के कारण अंधता-लंगड़ा, लूलापन, अनेको रोग, शोक, परिताप, निर्बलता, अभव्य शरीर, पराधीनता, अशुभप्रदेश, नीच कुल, बुरा परिवार, अल्पायु, प्रिय वियोग तथा विभिन्न कष्टों की प्राप्ति होती है आज हम जो तरह-तरह के दुखों व क्लेशों से जकड़े है, यह किसी जन्म में हमारे द्वारा अन्य प्राणियों को सताने व उनकी हिंसा का ही परिणाम है |
     मनुष्य अपने जीवन को बचाने के लिए राजपाट सुख वैभव व स्वजन परिवार को भी छोड़ने  हिचकिचाता है | जीवन प्राणी को इतना प्यारा है | अतः जीव-हिंसा का पाप पृथ्वी के समस्त ऐश्वर्य के दान करने से भी कटा नहीं जा सकता है | अहिंसा, दया, परोपकार ये गुण हमारी आत्मा की रक्षा मातृवत सदैव करते है |
       संसार रूपी निर्जन वन में भटकती जीवात्मा के लिए अहिंसा अमृत तुल्य जल स्रोत है| दुःख रूपी दावानल के शमन के लिये वः पुष्कर मेघ स्वरुप है | पुनर्जन्म के रोग को मिटाने की रामबाण औषधि है |
      सभूम, ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती, श्रेणिक, कोणिक आदि राजा व कालसोरिक कसाई आदि  जीवात्मा हिंसा, क्रूरता के कारण नरकगति को प्राप्त हुई एवं नानाविध दुःख के अथाह सागर में गोते लगा रहे है | सुलसा, दमनक, हरिबल, यशोधर आदि की आत्मायें अहिंसा पालती हुई स्वर्गादि शुभगति को प्राप्त हुई |
     तीर्थंकर परमात्माओं ने अहिंसा व्रत को सर्वोत्कृष्ट बताया है | अतः ग्यारह व्रतों को इस व्रत के पोषक के रूप में बतलाये है | अतः प्रत्येक श्रावक को यथाशक्ति अहिंसा व्रत के पालन की प्रतिज्ञा लेनी चाहिये | विश्व के सब जीवों की अहिंसा का नियम तो अहिंसा महाव्रत धारी पूज्य मुनि भगवंत ही ले सकते है किन्तु हम गृहस्थ भी एक अंश तक अहिंसा का पालन कर सकते है |
    किसी भी जीव को हानि नहीं पहुँचाना, उस पर किसी भी तरह का अत्याचार न करना यह पूर्ण दया है | गृहस्थ पूर्ण दया के सोलहवे भाग की दया का ही पालन कर सकता है | त्रस व स्थावर दो तरह के जीव विश्व में है इन दोनों तरह के जीवों की रक्षा करना पूर्ण अहिंसा है | इसमें से गृहस्थ केवल सवा विश्वे अहिंसा का ही पालन कर पाता है | इसको निम्नलिखित तालिका द्वारा समझ सकते है -

 हिंसा
1. त्रस, स्थावर जीवों की हिंसा करना ...... 20 विश्व हिंसा 
2. अगर स्थावर जीवों का बचाव न करे ....... 10 विश्व हिंसा 
3. गृहस्थ अपराधी त्रस जीवों को न बचाये ....... 5 विश्व हिंसा 
4. गृहस्थ प्रारम्भिक कार्यों में आवश्यक समय में निरपराधी जीवों को नहीं बचाता ...... 2.5 विश्व हिंसा 
5. विशेष समय में विशेष कारण वश त्रस जीवों को हानि पहुँचाना ...... 1.25 विश्व हिंसा  
  अहिंसा

1. त्रस व स्थावर जीवों की पूर्ण रूप से रक्षा करना। ....... 20 विश्व अहिंसा
2. केवल त्रस जीवों की रक्षा करना 10 विश्व अहिंसा
3. निरपराध त्रस जीवों की रक्षा करना 5 विश्व अहिंसा 
4. कामकाज के समय निरपराध त्रस जीवों की रक्षा करना 2.5 विश्व अहिंसा 5. विशेष समय भी यथाशक्ति जीवों को बचाना 1.25 विश्व अहिंसा      
उपरोक्त तालिका का वर्णन निम्न प्रकार से है -
1.  गृहस्थ स्थावर जीव (मिट्टी, पानी, वायु और वनस्पति के जीव) की रक्षा करने में असमर्थ है | हर घर में चूल्हा, चक्की, ओखली व पानी के घड़े रहते है | खाने के लिये सब्जियाँ बनाई जाती है | मकान बनाने में, खेतीबाड़ी करने में स्थावर जीवों की पूर्ण रक्षा का नियम लेकर नहीं चलाई जा सकती है | अतः श्रावक मात्र त्रस (हिलते, डुलते) जीवों की रक्षा के नियम ले सकता है | अतः उसका अहिंसा व्रत पालन का सामर्थ्य आधा याने 10 विश्वे ही रह जाता है |
2. चलते फिरते त्रस जीव अपराधी व निरपराधी दो भागों में विभक्त किये जाते है | गृहस्थ के लिये अपराधी जीवों को बचना संभव नहीं है क्योंकि इससे उसे अपने सांसारिक कार्य में बाधा पड़ती है | चोर, व्यभिचारी, बेईमान आदि प्राणियों को दण्ड देना व दिलाना पड़ता है | ऐसा न करने पर गृहस्थ धर्म के पालन में हानि होने की संभावना रहती है व लोक व्यवहार बिगड़ जाता है | यदि कोई राजा अथवा राजकर्मचारी अपराधियों को दण्ड न देकर क्षमा करदे तो उसका न्याय तथा प्रबंध किसी तरह स्थिर नहीं रह सकता है | अन्याय बढ़ जाये तथा अत्याचारी व्यक्ति लोगों पर अत्याचार करने लग जाये | अतः मात्र निरपराधी जीवों की रक्षा ही शेष रही | इसमें से पांच विश्वे कम हो गये, शेष सिर्फ पांच विश्वे रहे | श्रावक के अहिंसा व्रत में अपराधियों को दण्ड देने की छूट है | इससे गृहस्थ धर्म भी स्थिर रह जाता है और नियमों पालन भी हो जाता है | 

3. गृहस्थ संसारिक कामकाज में नीरपराध जीव की भी हिंसा किया करता है, कृषि कार्य, कुआं खुदाई, मकान निर्माण आदि कार्यों में जो हिंसा हो जाती है | घोड़ा, बेल आदि की सवारी, उन पर बोझ लादने आदि में भी जीवो को दुख होता हे | इसी तरह अनेक व्यापार-व्यवसाय के कामों में गृहस्थ से निर्दोष जीवो की हिंसा होती है | अत: शेष 5 विश्वो में भी पचास प्रतिशत ही दया का पालन होता है | अत: श्रावक से अढाई विश्व दया का पालन ही शेष रह गया |

4. ऐसे ही गृहस्थ बहुत है जो कामकाज के बिना भी निर्दोष जीवो को हानि पहुंचाते है और किसी निर्दोष को ही चोर या शत्रु मान लेता है किसी पूर्व अपराधी को जो अब सुधर गया है पर बिना कारण शकर उसे दंड दिलाते हैं घुड़दौड़ व अन्य पशु पक्षियों के खेल खिलवाड़ करवाना अपने पुत्र पुत्रियों को पढ़ाते समय या बुराई से रोकने के लिए प्रताड़ना करना अपने पशु पक्षियों के घावो को ठीक करने के लिए उनमे कृमि-किटो को दवाई लगाकर नाश आदि कर हिंसा की भावना नहीं होने पर भी गृहस्थ को करने पडते वह | इस करण अढाई विश्वे की अहिंसा का पचास प्रतिशत याने सवा विश्व की अहिंसा का ही गृहस्थ पालन कर सकता है |

अतः सर्व विरति साधु-भगवन्तों की तुलना में गृहस्थ सोलहवें हिस्से की दया अथवा अहिंसा ही पाल सकता है | गृहस्थ के लिए आवश्यक है कि वह निरपराध त्रस जीवों की हिंसा बिना काम के अथवा किसी विशेष कारण के बिना, जान बूझ कर नही करे, एवं इस तरह की हिंसा करने वालों को भला न जाने |

अहिंसा व्रत के अतिचार

इस व्रत में पांच दोषों का लगना सम्भव है इन दोषों से बचने के लिए श्रावक को अत्यंत सावधान रहने की आवश्यकता है | अतिचार के लगने से व्रत खंडित तो नही होता किन्तु उस पर उचित ध्यान देकर प्रायश्चित न करने पर व्रत के पालन में ढिलाई आ जाती है | और यदा कदा व्रत का भंग भी हो जाता है | अतः शास्त्र कारों की आज्ञा है कि नित्य प्रातः हम अपने जीवन सम्बन्धी कार्यों का पर्यवेक्षण करते रहे | यदि कभी कभार जान अनजान से कोई दोष लग जाय तो उसे सुधारने का यत्न किया जाना चाहिए | अपने किये दोष के लिए पश्चाताप तथा आगे से उस दोष को दूर रखने का नियम लेना चाहिए | इस तरह की विशुद्ध भावना रखने पर मन प्रशांत होता है व किसी प्रकार की भूल की भविष्य में संभावना नही रहती है | दोनों समय प्रतिक्रमण करने का विधान अतिचारों की आलोचना के लिए ही बनाया गया है | अपने कार्यों में सावधानी रखते हुए व उन पर सूक्ष्म दृष्टि रखे तो धर्म ध्यान में मन लगा रहता है व व्रत खण्डित नही होता |

अहिंसा व्रत के पांच अतिचार निम्नानुसार है :-

1. तीव्र क्रोध के वशीभूत होकर प्राण-हानि का विचार रखे बिना किसी जीव को निर्दयता व क्रूरता से पीटना |

2. अकारण क्रोध वश किसी जीव की देह में दाग लगाना, अस्त्र-शस्त्र घोपना अथवा मर्म में छेद करना |

3. किसी प्राणी से शक्ति से अधिक बोझ उठवाना अथवा शक्ति उपरांत काम लेना |

4. क्रोध में आकर अकारण किसी जीव के मर्म स्थल पर प्रहार करना जिससे उस जीव की मृत्यु हो जाये |

5. अपने आश्रय में रहने वाले प्राणियों को भूखा प्यासा रखना, सर्दी-गर्मी से उनकी रक्षा न करना, असमय काम लेना, रोग की अवस्था मे उनकी चिकित्सा आदि न करवाना आदि अहिंसा व्रत के अतिचार है | मानवीय कर्तव्यों को पूरा न करना भी अतिचार है |

नोट- इनके अलावा धर्म प्रेमी गृहस्थ को पानी, वायू, अग्नि और वनस्पति का अनावश्यक, अकारण प्रयोग नही करना चाहिए | आज विज्ञान भी मान चुका है कि इनमें जीव है | श्रावक होकर जीवों को व्यर्थ हानि क्यों पहुँचावे ? जिनेश्वर परमात्मा का धर्म सब जीवो की रक्षा करना सिखाता है |

(2) स्थूल मृषावाद विरमण व्रत

1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

4 व्रत मैथुन का सार भेजिए

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